रविवार, 20 जून 2010

विचार विमर्श

मुक्ति के सपने देखती औरतों का अलग अलग धरातल


पाठकों, आज हम अपने ब्लॉग में स्त्री मुक्ति के उन्मुक्त गगन में पंख फड़फड़ाने की इच्छुक महिलाओं की आर्थिक वैचारिक सीमाओं के आधार पर उनका एक ठोस वर्गीकरण करने की श्रृंखला जारी करने जा रहे हैं. आप सभी चेतनाशील एवं प्रबुध्ध पाठकों से अनुरोध है की इस वैश्लेषिक वर्गीकरण पर अपनी राइ और अपने मतभेद प्रेषित करें ताकी हम एक स्वस्थ विचार विमर्श के जरिये एक और अधिक उच्च वैज्ञानिक धरातल पर खड़े हो सकें. हमारा पहली श्रेणी है:



औरतें जो मुक्ति का अर्थ नहींजानती हैं



भारत की स्त्रियों में स्त्रीविमर्श के दृष्टिकोण से स्त्रीमुक्ति की प्रचलित समझ के स्तर को निश्चित खांचों या खानों में बांटना तो कठिन है लेकिन वर्तमान स्थितियों, परिस्थितियों के आधार पर स्त्रिायों की समझ, सोच व अवधारणा के विभिन्न स्तर व रूझानों को चिधित तो किया ही जा सकता है। भारत में मुक्ति की यह सोच ऊपर के तबके की स्त्रियों में कुछ हद तक जरूर काफी व्याप गई है, भले वह अभी भी अधकचरी समझ ही है। करोड़ों स्त्रियाँ इस सोच से अनजान हैं कि ये भी कटु सत्य है। आज स्त्री विमर्श और स्त्री मुक्ति का सपना ऊंची उड़ने भरने के लिए अपने डैने फड़फड़ा कर खुद को गतिमान बनाने की मुहिम चलाने में तो कामयाब हुआ है लेकिन यथार्थ के धरातल पर ये सपने कितने परवान चढ़े उनकी वस्तुस्थिति क्या है इसे परखना जरूरी है।

1 टिप्पणी:

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

नमस्कार रमणिका जी,
आज पहली बार आपका ब्लॉग देखा, बधाई.
लेखन की क्या तारीफ़ करें वो तो समूचा देश करता ही है....
शेष कुशल है...
कुमारेन्द्र सिंह सेंगर, उरई
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड


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