रविवार, 15 सितंबर 2013

हाशिये उलांधती औरत के तीन खंडों का लोकार्पण

स्त्री विमर्श की वृहत परियोजना


रमणिका फाउंडेशन के तत्वावधान में स्त्री विमर्श पर एक वृहत परियोजना पर काम हो रहा है। इसमें 40 भाषाओं में लिखी गई स्त्री संघर्ष की कहानियों को समेटा जा रहा है। इनका दायरा कई कालखंडों तक फैला हुआ है। इनका प्रकाशन युद्धरत आम आदमी पत्रिका के विशेषांकों के रूप में हो रहा है। हाशिये उलांघती औरत शीर्षक की इस श्रृंखला के अंतर्गत हिन्दी कहानियों के तीन खंडों का लोकार्पण 11 सितंबर 2013 को दिल्ली स्थित साहित्य अकादमी के रवींद्र भवन में संपन्न हुआ। लोकार्पण माकपा की जुझारू नेत्री वृंदा करात के हाथों हुआ। इस मौके पर उन्होंने कहा कि इन संकलनों के जरिए महिलाओं की पीड़ाअनुभव और उनके संघर्ष की सृजनशीलता को सामने लाने का काम किया गया है। हिन्दी की सुप्रसिद्ध आलोचक निर्मला जैन ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि एक वर्ष के अंदर इतनी सारी कहानियों को संकलित किया जाना अपने आप में अद्भुत है। इसमें स्त्री संघर्ष का एक व्यापक और ऐतिहासिक फलक उभरता है। उनका मानना था कि स्त्री विमर्श और उसके संघर्ष को व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है। दुनिया की अलग-अलग जगहों पर स्त्री संघर्ष के अलग-अलग शेड्स हैं। सबको एक जगह समेटकर कोई एक रूप नहीं दिया जा सकता। युरोपीय देशों में स्त्री संघर्ष के जो मुद्दे हैं वह भारत में नहीं हैं। दूसरी बात यह कि स्त्री विमर्श का अर्थ पुरुषों के प्रति पूर्वाग्रह कदापि नहीं होना चाहिए। फाउंडेशन की अध्यक्ष रमणिका गुप्ता के मुताबिक इस परियोजना पर एक टीम के तहत अनामिकाअर्चना वर्मासबीहा जैदीहेमलता महेश्वरकंचन शर्माशीबा फहमी और विपिन चौधरी के सहयोग से काम किया जा रहा है और अबतक 22 भाषाओं की कहानियां फाउंडेशन के पास एकत्र हो चुकी हैं। इसमें तेलगूमराठीगुजरातीपंजाबी और पूर्वाेत्तर की कहानियों के संकलन तो अब छपने के लिए तैयार भी हो चुके हैं। उनका कहना था कि आज औरत बोलने लगी है। उसके अंदर न कहने का साहस आ चुका है। औरत को अगर मुक्ति चाहिए तो उसे जोखिम उठाना पड़ेगा। हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने कहा कि सेक्स स्त्री जीवन का दमनकारी तत्व है इसलिए वही उसकी मुक्ति का साधन भी हो सकता है। स्त्री पुरुष का युग्म ही समाज की इकाई है। इस युग्म के बिना समाज में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। अर्चना वर्मा ने इस श्रृंखला की तैयारी के अपने अनुभवों का जिक्र करते हुए कहा कि जिन 40 भाषाओं की कहानियों को संकलित किया गया है उनमें कई भाषाएं तो ऐसी हैं जिनकी रचना पहली बार सामने आई है। कई भाषाएं अभी बोली के स्तर पर हैं। कुछ ही के पास अपनी लिपि है। लेकिन उन्हें संकलित कर हिन्दी में अनुवाद का काम निरंतर चल रहा है। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि भारतीय स्त्री विमर्श के राजनैतिक संदर्भ पर सवाल उठाने वालों को जवाब देने के लिए  ये संकलन पर्याप्त हैं।

उन्होंने कहा कि हिन्दी में जब स्त्री विमर्श की चर्चा करते हैं तो विकृत खबरों को सिर्फ  दरिंदगी का पर्याय नहीं बल्कि स्त्री संघर्ष को दमन करने वाला पुरुषवादी प्रयास माना जाना चाहिए। बलात्कार की घटनाएं सिर्फ देह प्राप्ति के लिए नहीं बल्कि औरतों को सबक सिखाने के लिए भी अंजाम दी जाती हैं। यह पुरुष वर्चस्व को स्थापित करने का एक जरिया बन जाता है। अनामिका ने संकलन की कई कहानियों पर विस्तार से चर्चा करते हुए स्त्री की भाषातेवरकथ्य और शिल्प के बदलावों को रेखांकित किया। मैत्रेयी पुष्पा ने अपने वक्तव्य में कहा कि यदि यह संकलन नहीं आता तो वह सुभद्रा कुमारी चौहान या महादेवी वर्मा की कहानी कभी नहीं पढ़ पाती। इन्हें वे सिर्फ कवयित्री के रूप में जानती थीं। उनकी कहानियों को पढऩे पर महसूस हुआ कि उनके जमाने में भी वही आग थी जो आज है। विपिन चौधरी ने कहा कि स्त्रियों के मानवीय अधिकारों को लेकर बहुत सारी बातें इस संकलन की कहानियों के जरिए सामने आई हैं।
कार्यक्रम का संचालन चर्चित कथाकार अजय नावरिया ने किया। इस अवसर पर शब्दांकन के संपादक भरत तिवारीसविता सिंहअशोक गुप्ताज्योति कुमारीरेणु यादवअनिता भारतीश्योराज  सिंह बेचैन तेज सिंहदेवेंद्र गौतम तथा अनेक बुद्धिजीवीसाहित्य प्रेमी और छात्र उपस्थित थे।


1 टिप्पणी:

Mazkoor Alam ने कहा…

isme koi shak nahi ki ramanika ji ka kam adbhut hai.


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