शुक्रवार, 6 मई 2011

प्रेस विज्ञप्ति


रिपोर्ट
 राजधानी दिल्ली में पहली बार 25 भिन्न भारतीय भाषाओं की स्त्रीवादी कवयित्रियों की अनुगूंज सुनाई दी। स्त्री मुक्ति और स्त्री सौंदर्य की परिभाषा को नये सिरे से गढ़ते हुए महिला कवियों ने एकमत से कहा कि अब स्त्रीवादी लेखन को लेकर आनंद का समय आया है। मौका था साहित्य अकादेमी, रमणिका फाउण्डेशन और ‘युद्धरत आम आदमी’ के संयुक्त तत्वावधान में ‘हाशिये उलाँघती स्त्री’ कविता-पाठ पर एक दिवसीय कार्यक्रम का।
 26 मार्च को हुए इस कार्यक्रम ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य अकादमी एक सांझे मंच की तरह भारत की तमाम भाषाओं के साहित्य के तौर पर मिलाने का काम कर रहा है। रमणिका फाउण्डेशन के साथ साहित्य अकादमी ने और भी काम किया है। उन्होंने बताया कि रमणिका फाउंडेशन द्वारा तैयार आदिवासी अंक को देख कर एक आदिवासी ने कहा कि ऐसा कार्य तो हमने आज तक नहीं देखा। उन्होंने रमणिका फाउंडेशन के कार्य को रेखंकित   करते हुए कहा कि इस आयोजन के जरिये उन्होंने एक इतिहास रच दिया है।
 रमणिका गुप्ता अध्यक्ष रमणिका फाउण्डेशन एवं संपादक ‘युद्धरत आम आदमी’ के आरंभिक भाषण में ें ‘हाशिये उलांघती स्त्री’ विषयक गोष्ठी और इसी नाम से इसी विषय पर प्रकाशित युद्धरत आम आदमी के विशेषांक की स्त्री-दिवस के उपलक्ष्य में विशेष चर्चा करते हुए स्त्री मुक्ति की अवधारणा के विकास के बारे में चर्चा की। उन्होंने कहा कि कविता में स्त्री मुक्ति की अवधारणा के बीज हिन्दी में मीरा, पंजाबी में पारो परेमन और में कन्नड़  की अक्कमहा देवी (अक्कअम्मा) तक जाते है।  इस संकलन में हमने 334 स्त्री मुक्ति पर लिखने वाली कवयित्रियों को शामिल किया है जिनमें 127 हिन्दी की हैं और 207 हिन्दीतर भाषाओं की। इन सभी भिन्न-भिन्न भाषी कविताओं में स्त्री मुक्ति का एक सुर गूंजा है, भले उसका स्वर, लय या धुन भिन्न-भिन्न हो। अपने आरंभिक वक्तव्य में रमणिका गुप्ता ने विशेषांक की तैयारी के दौरान आई चुनौतियों के बारे में बताया और कहा कि उनकी कोशिश स्त्रिायों को पुरुष के खिलाफ खड़ा करना नहीं है। स्त्री की मुक्ति का अर्थ पुरुष से मुक्त होना लगा लिया जाता है, देह की मुक्ति का आशय यौनता से लगाया जाता है जबकि हमारा आशय मानसिक तथा दैहिक स्तर पर अपने निर्णय लेने के अधिकार से है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्त्री-मुक्ति के आंदोलन का मतलब यह नहीं कि इसमें सिर्फ महिलाएं ही शामिल हों बल्कि यह पुरुषवादी दृष्टि से सोचने-समझने की एक खास मानसिकता में कैद हो चुके समाज को मुक्त करने को आंदोलन है, स्त्री-पुरुष को समाज में समान दर्जा दिलाने की मुहिम है। जाहिर है मुक्ति के इस आंदोलन में स्त्री-पुरुष दोनों की साझी जरूरत है। उन्होंने कहा कि स्त्रियों को पुरुष-दृष्टि से सौंदर्य की परिभाषा गढ़ने की जगह अपनी सौंदर्य-दृष्टि विकसित करनी होगी। उन्होंने कहा कि एक मध्यवर्गीय कामगार महिला, एक मजदूर महिला और एक अभिजात वर्ग की महिला के लिए स्त्री-मुक्ति की अवधारणाएं अलग-अलग हैं। उनके सौंदर्य की कसौटियां भी अलग-अलग हैं। हो सकता है कि एक अभिनेत्री के लिए कमनीय देहयष्टि की जरूरत हो, पर एक मजदूर महिला के लिए स्वस्थ और हट्टे-कट्टे शरीर की आवश्यकता है। इसलिए महिलाओं को भी सौंदर्य-शास्त्रा की पुरुषवादी जकड़न और बाजारवादी दृष्टि से मुक्त होने की जरूरत है, जिसका वे चाहे-अनचाहे शिकार हो जाती हैं।
उन्होंने कहा कि स्त्रियों को अपने सौंदर्य की कसौटी खुद गढ़ने की जरूरत है। उन्हें पुरुषों के लिए नहीं, अपने लिए सुंदर दिखने की जरूरत है। सौंदर्य के चालू मुहावरों के हिसाब से नहीं वरन अपने जरूरत के मुताबिक अपने सौंदर्य की नयी परिभाषा गढ़ने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यहां असल लड़ाई निर्णय के अधिकार और समानता की है जिससे यह पुरुषवादी समाज हर क्षण आतंकित रहता है। गुजरात की कवयित्री योगिनी श्क्ल की कविता की ओर ध्यान खींचते हुए उन्होंने कहा कि हमारे यहां श्रृंगार की कविताएं खूब होती हैं। विडंबना देखिये कि स्त्रियों को रोशनी कहते हैं और उनसे उनका सूरज छीन लिया जाता है। उन्होंने कहा कि आकर्षण सिर्फ सूरत का नहीं, सीरत का भी होता है। उन्होंने बताया कि पूर्वोत्तर में सूर्य को स्त्राी माना जाता हैµयानी शक्ति का प्रतीक स्त्री है। यह दो संस्कृतियों व मानसिकता के सामाजिक ढांचे में एक महत्त्वपूर्ण फर्क को रेखांकित करता है। 
 समारोह के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध चिंतक भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर के सचिव तथा रमणिका फाउण्डेशन के ट्रस्टी सदस्य गणेश नारायण देवी ने युद्धरत आम आदमी पत्रिका के विशेषांक हाशिये उलांघती स्त्री का विमोचन किया और गोष्ठी के उद्घाटन व्याख्यान में कहा कि  शिक्षा और चिकित्सा के स्तर पर केवल गरीब स्त्रिायों की ही नहीं सम्पन्न स्त्रियों की भी उपेक्षा की जाती है। उन्होंने बताया कि पश्चिमी देशों में तो उन्नीसवीं सदी के मध्य तक महिलाओं को लेखक ही नहीं माना गया। हमारे यहां स्थिति थोड़ी भिन्न थी। हमारे यहां मीरा को भले जहर पीना पड़ा था लेकिन उनकी कविताएं घर-घर पहुंचीं। उन्होंने कहा कि अब स्त्रियों की दशा में थोड़ा सुधार आया है और देश में शिखर के संवैधानिक पदों पर महिलाएं जरूर आ गयी हैं पर आम महिलाओं की हालत में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं आया है। अखबार की खबरों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि महिलाएं और भी असुरक्षित होती जा रही हैं। एक तरफ देश का विकास हो रहा है और इस इन्फ्रास्ट्रक्चरल विकास का बोझ जैसे महिलाओं के सिर पर ही डाल दिया गया है। उन्होंने ‘हाशिये उलांघती स्त्राी’ विशेषांक के प्रकाशन को तमाम निराशाओं के बीच अंधेरे में उम्मीद की चमक बिखेरने वाला ऐतिहासिक घटना कहा। उन्होंने आगे कहा कि स्त्री-स्वर का इस स्वरूप में आना एक नयां इतिहास गढ़ना है। आशीष नंदी को याद करते हुए उन्होंने कहा कि गांधीजी ने सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा और नमक सत्याग्रह का तरीका स्त्रियों से ही ग्रहण किया। उन्होंने साहित्य अकादमी से अपेक्षा की कि इन दोनों खण्डों का सम्मिलित भाषाओं में भी अनुवाद किया जाना चाहिए।
 कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात कवि तथा ललित कला अकादमी के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि साहित्य अपने अंधेरों के समक्ष खड़ा होने की हिम्मत जुटाता है, उससे भागता नहीं है और न ही उसे छुपाने की कोशिश करता है। स्त्रियों का यह लेखन साहित्य में लोकतंत्रा को मजबूत स्थिति प्रदान करता है। इस संग्रह में संग्रहित कविताओं को उन्होंने नयी दुस्साहसिकता का उपक्रम कहा। रमणिका गुप्ता की बात की ताईद  करते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य का सृजन करने वाली स्त्रियों को पुरुषों की स्थापित सौंदर्य दृष्टि से अलग हट कर अपनी सौंदर्य दृष्टि गढ़नी चाहिए। साथ ही यह अपेक्षा भी दर्ज की कि स्त्रियों के साहित्य से एक नये तरह का कर्म-सौंदर्य निकलना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्त्रियां अपने लेखन में बहुत हद तक सामाजिकता की बात करती हैं लेकिन उसमें उनकी अंतरंगता गायब है।
 प्रसिद्ध कवयित्री एवं युद्धरत आम आदमी के ‘हाशिये उलांघती स्त्री’ के विशेष अंक की अतिथि संपादक अनामिका ने अपने बीज भाषण में बताया इस संकलन में संकलिता कविताएं एफ.आई.आर. की तरह उपस्थित हैं। यह स्त्री आंदोलन ऐसा आंदोलन है जिसने एक बूंद भी खून नहीं बहाया और चहुंमुखी विस्तारित हो रहा है। स्त्रियों को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती हैं ये कविताएं नए मानदंड, नए प्रतिमान गढ़ती हैं ये कविताएं। उन्होंने कहा कि स्त्री चेतना की बेल कैद की दीवारों के ऊपर चढ़ कर आजादी का अनुभव करने लगी हैं। उन्होंने कहा कि यह बेल अब इस कदर ऊपर चढ़ गयी है कि हमें अब इनसे आनंद फल पाने की उम्मीद बांधनी चाहिए।
 मलयालम की आलोचक के. वनजा ने दक्षिण भारत में स्त्री मुक्ति की काव्यधारा के विकास पर अपना आलेख पढ़ा। युद्धरत आम आदमी की सहयोगी संपादक दलित आलोचक एवं कवयित्री हेमलता महिश्वर ने उत्तर भारत की काव्य धारा में स्त्री मुक्ति के अंकुरों के पेड़ बनने तक की विकास यात्रा का ब्योरा देते हुए बताया कि समस्त कवयित्रियों के स्वर में एकसूत्राता दृष्टव्य होती है। यह एकसूत्राता स्वयं के प्रति निष्ठुर समाज के प्रत्येक अत्याचार का विरोध
अभिधा, व्यंजना एवं लक्षणा में व्यक्त करती हैं। यह पहला अवसर था जब बाइस विभिन्न भारतीय भाषाओं की स्त्रीवादी कवयित्रियां, दिल्ली में एक मंच पर उपस्थित हुईं। इस सत्रा में के. वनजा की ‘चित्रा मुद्गलः एक मूल्यांकन’ नामक आलोचनात्मक पुस्तक का विमोचन अशोक वाजपेयी और गणेश देवी ने किया।
 उद्घाटन सत्रा में सलमा, प्रतिभा नंदकुमार, ग्रेस कुजूर ने काव्य पाठ किया। तीसरे सत्रा में दीप्ति नवल का शामिल होना कार्यक्रम का अतिरिक्त आकर्षण था। कविता-पाठ के तीन सत्रों में अपनी कविताओं से श्रोताओं को आंदोलित करने वालों में प्रमुख थी  बी. संध्या (मलयालम), कुट्टी रेवती (तमिल), शाहजहाना (तेलुगू) सोमा बंद्योपाध्याय (बांगला), मीनाक्षी गोस्वामी बरठाकुर (असमिया), जोगमाया चकमा (चकमाµत्रिपुरा) हीरा बनसोडे (मराठी), उषा उपाध्याय (गुजराती), दाँङी चाँडथू (मिजो), लाइरेनलाकपम (पैतैµमणिपुरी), निरुपमा दत्त(पंजाबी), शुभा, सविता सिंह, रंजना जायसवाल, अनिता भारती (हिंदी), विभा रानी (मैथिली), निर्मला पुतुल (संथाली), सरिता बड़ाइक (नगपुरिया झारखंड), दरख़्शां अंदराबी (कश्मीरी), तरन्नुम रियाज (उर्दू)श्, दीप्ति नवल, लक्ष्मी कन्नन (अंग्रेजी)। इस आयोजन में हिन्दी की तीन, अंग्रेजी की दो, उर्दू, मराठी, गुजराती, पंजाबी, बांगला, ओड़िया, मिजो, चकमा, मणिपुरी-पैतै, असमिया, संथाली, नगपुरिया, कश्मीरी, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़ भाषा की एक-एक, तामिल की दो।
 रमणिका गुप्ता द्वारा संपादित ‘युद्धरत आम आदमी’ के ‘हाशिये उलांघती स्त्री’ कविता अंक की अतिथि संपादक हैं  अनामिका। सम्पादन सहयोग में हेमलता महिश्वर, कंचन शर्मा और उषा उपाध्याय, साॅलजी थॅमस, हरीश परमार हरप्रीत और विपिन चैधरी का नाम लिया गया!
 भारतीय स्त्री कविता के इस भास्वर संकलन पर 2004 से काम शुरु हुआ। सात-आठ वर्षों के अथक संयुक्त श्रम का नतीजा है हिन्दी और हिन्दीतर कविताओं पर केन्द्रित ये दो भाग जिनका लोकार्पण इस अवसर पर गणेश नारायण देवी के हाथों हुआ। स्त्री-मुक्ति आंदोलन की चार पीढ़ियाँ भारतीय भाषाओं में अपनी सर्जना का प्रकाश कैसे फैला रही हैµ इसका जायजा यहाँ मिलता है।
 इस अवसर पर रमणिकाजी की कहानी ‘नई मेनका’ का सजीव पाठ एवितोको की ओर से मुम्बई की विभा रानी ने किया। विभा रानी के नाटक ‘आओ तनिक प्रेम करें’ और ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ पर मोहन राकेश अवार्ड 2005 मिला। उनके ब्लाॅग ‘छम्मकछल्लो कहिस’ पर 2009 में लाडली इंडिया अवार्ड मिला। कार्यक्रम के तीन सत्रों का कुशल संचालन अल्का सिन्हा, सुधीर सागर और पूनम तुषामड़ ने किया।

रमणिका फाउंडेशन एवं साहित्य अकादेमी द्वारा जारी     26 मार्च 2011
 

1 टिप्पणी:

डॉ.कविता वाचक्नवी Dr.Kavita Vachaknavee ने कहा…

यह बहुप्रतीक्षित अंक आ गया, जानकार हर्ष हुआ. इतना भव्य कार्यक्रम और पत्रिका का सार्थक संयोजन दोनों ही महत्वपूर्ण हैं.

रमणिका दीदी की जाने कितनी रातों की नींद और दिन का चैन इस अंक के पन्ने पन्ने में पिरोया गया है. मैं तो स्वयं साक्षी हूँ उनके जी-जान से जुटे होने की. उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ.

अंक देखना तो भारत जाने पर, जाने कब संभव होगा... अभी तो बस उत्कंठा ही बनी हुई है.

विवरण पढ़कर अत्यंत प्रसन्नता हुई. सभी को पुनः बधाई.


Related Posts with Thumbnails