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शनिवार, 29 मार्च 2014

हाशिए उलांधती औरत कहानी के पांच खंडों पर संगोष्ठी और लोकार्पण

रमणिका फाउंडेशन की परियोजना


नई दिल्ली: आज दिनांक 28 मार्च 2014 को स्कूल आॅफ इंटरनेशनल, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज के कमेटी रूम नं 203 में ‘हाशिये उलांघती औरत’ के पांच खंडों तेलुगु, प्रवासी, पंजाबी मराठी और गुजराती का लोकार्पण तथा संगोष्ठी सम्पन्न हुई। यह कार्यक्रम तीन सत्रों में सम्पन्न हुआ। बाकी के दो सत्र कल दिनांक 29 मार्च को हुए।
जे.एन.यू. के उपकुलपति प्रो. एस.के सोपोरी, नया ज्ञानोदय के संपादक लीलाधर मंडलोई, राजेंद्र
उपाध्याय तथा तेलुगु लेखिका जे. भाग्यलक्ष्मी के हाथों इन पांच भाषा खंडों  एवं वासवी किडो¨ की पुस्तक ‘‘भारत की क्रांतिकारी आदिवासी वीरांगनाएं‘‘ तथा राजकुमार कुम्बज क¢ कविता संकलन ‘दृश्य एक घर है’ का ल¨कार्पण हुआ। प्रो. सोपोरी ने अपने वक्तव्य में कहा कि ‘‘शायद ही पहले ऐसा हुआ हो कि एक साथ पांच-पांच भाषाओं के अलग-अलग खंडों का लोकार्पण हुआ हो। यह एक बहुत बडा काम है। उन्होंने खुद भी इस रमणिका फाउंडेशन के अभियान में शामिल होने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि रमणिका फाउंडेशन ने 40 भाषाओं की स्त्री मुक्ति पर आधारित कहानियों का अनुवाद हिंदी में करके इस विश्वास को सिद्ध किया है कि भाषाएं जोड़ती हैं और विभिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद कायम करती हैं। तेलुगु लेखिका भाग्यलक्ष्मी ने अपने वक्तव्य में कहा कि यह एक बहुत बड़ा काम है और बहुत गंभीर मुद्दा है। जिसे रमणिका फाउंडेशन ने उठाया है। उन्होंने कहा कि साहित्य अकादमी 24 भाषाअों तक ही सीमित है अौर छिटपुट कुछ अन्य भाषाएं लेती है। लेकिन रमणिका फाउंडेशन ने अपना दायरा 40 भाषाअों तक बढ़ाया है। इतने बड़े अनुवाद का कार्य फाउंडेशन ने किया है। फाउंडेशन की अध्यक्ष रमणिका गुप्ता ने इस पूरे ऋंखला की योजना तथा संपादकीय अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि स्त्री-मुक्ति की अवधारणा अौर उसके इतिहास को लेकर एक विशेष शोधपरक कार्य है। उन्होंने कुलपति के समक्ष अंग्रेजों की खिलाफत की  जिस वीर ऩङवाह को फांसी की सजा़ दी गई थी, के नाम पर जे.एन.यू. में प्रस्तावित पूर्वोत्तर भाषाओं  के केन्द्र का नामकरण करने का प्रस्ताव भी रखा। जिस पर कुलपति ने लिखित प्रस्ताव मांगा और इसपर विचार करने का आश्वासन दिया।’’
उद्घाटन सत्र को अध्यक्ष लीलाधर मंडलोई ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि ‘‘रमणिका जी ने भाषा को बचाने की कार्रवाई की है। यह खंड एक तरह से आरकाइवल वर्क है।’’ उन्होंने पंजाबी खण्ड की कहानियों पर विस्तार से चर्चा की। तेलुगु खंड के संपादक मंडल में शामिल जे.एल. रेड्डी ने तेलुगु भाषा में चलम द्वारा चलाए गए स्त्री आंद¨लन तथा तेलुगु खंड की कई कहानियों का उल्लेख किया और तेलुगु लेखन में मुक्ति की अवधारणा एवम् मुस्लिम लेखिकाअों में आई चेतना से अवगत कराया। राजेन्द्र उपाध्याय ने अपने आलेख पाठ के माध्यम से कहा कि रमणिका जी ने ‘‘गागर में सागर भर दिया है।’’ डाॅ. अर्चना वर्मा ने इस अभियान के अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि ‘‘स्त्री को केवल शरीर और शरीर को केवल काम वस्तु नहीं समझा जाना चाहिए। पुरुष की मुक्ति, स्त्री की मुक्ति में ही है।
‘‘दूसरा सत्र प्रवासी अंक पर केंद्रित था। इस सत्र में प्रवासी लेखिका उषा वर्मा तथा स्वाति सरोज ने अपने विचारों को व्यक्त किया तथा प्रवासी अनुभवों को साझा किया।’’
इस सत्र के अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने कहा कि सबसे पहले यह तय किया जाये कि प्रवासी किसे माना जाए? ‘‘उन्होंने यह भी कहा कि स्त्री-मुक्ति की धारणा और चेतना को व्यापक बनाने की जरूरत है। शरीर का मुक्त होना काफी नहीं मन की मुक्ति की बात भी होनी चाहिए।’’
कार्यक्रम के तीसरे सत्र में पंजाबी अंक की संपादक जसविंदर कौर बिन्द्रा ने अपने अनुभवों को साझा किया। रूपा सिंह ने आलेख पाठ किया। विशिष्ट वक्ता गीताश्री ने पंजाबी समाज के बारे में जानकारी दी और कहा कि भ्रम फैलाया जाता है कि पंजाबी स्त्रियां बहुत मुक्त अौर आजाद हैं। यह भी पुरुषों द्वारा फैलाया गया भ्रम है। वहीं सबसे ज्यादा अत्याचार ह¨ता है अौर अौरतों की खरीद बिक्री तथा दहेज हत्याएं होती हैं। कुछ उल्लेखनीय कहानियों पर चर्चा भी की। सत्र के मुख्य अतिथि मंजीत सिंह ने रमणिका फाउंडेशन की अध्यक्ष रमणिका गुप्ता को इस काम के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि ‘‘रमणिका जी ने हाशिए उलांघती औरत की इमेज को हिंदी भाषा में अनुवाद कराकर बड़ा काम किया है।“
अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए, प्रो. सलिल मिश्र ने कहा, ‘‘इस खण्डों का इतिहास से बहुत बड़ा संबंध है। यह सभी खण्ड आने वाली पीढि़यों के लिए एक दस्तावेज़ का काम करेंगे।’’
चौथे सत्र में मैत्रेयी पुष्पा ने अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कहा कि इससे पहले हिन्दी के तीन खंडों में महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान की कहानियां पढ़ भी नहीं पाती अगर रमणिका जी ये खंड लेकर नहीं आती। इन पांच खंडों में चार आयु वर्ग में विभाजित कहानियां पढ़ने को मिलेंगी।
 मराठी खंड की सम्पादक भारती गोरे ने कहा कि यौन -शुचिता और  देह की बात बार-बार हो रही है, जबकि देह हमेशा दोयम वस्तु रही है। पहला वार देह ही सहती है पर केवल देह की बात करना, स्त्री को देह मात्र तक सीमित करने जैसा है। उन्होंने कहा कि  अन्य प्रादेशिक भाषाओं की तुलना में मराठी कहानी बहुत आगे निकल चुकी है। इन कहानियों में स्त्री ने अपनी भाषा तथा अपने पात्र गढ़े हैं।“
गुजराती खण्ड की सम्पादक एवं अनुवादक प्रज्ञा शुक्ल ने कहा कि गुजरात में स्त्री-मुक्ति की अवधारण बहुत धीमी गति से चली है।
पांचवें सत्र में गंगा प्रसाद मीणा ने रमणिका फाउंडेशन की कार्ययोजना तथा विभिन्न भाषाओं के खण्डों पर रोशनी डाली।
 एन.डी.टी.वी. के निदेशक प्रियदर्शन ने कहा कि ”आज की स्त्रियां बदल गई है। वह अंधेरे में भी कैमरा थामे जिंदगी और मौत से जूझती हुई अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। रमणिका फाउंडेशन ने यह बहुत बड़ा काम किया है दूसरी भाषाओं की कहानियों का हिन्दी में अनुवाद करवा  कर उन्होंने देश को जोड़ा है।
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में अशोक वाजपेयी ने कहा कि लोकतंत्र में पहली बार लिखा जाने वाला साहित्य है। जिन्होंने सदियों के बाद अपनी चुप्पी तोड़ी है वह स्त्री बता रही है उसके साथ कैसा व्यवहार हो रहा है। उन्होंने कहा कि आज की स्त्री रचनाकारों को अपनी ही लेखिकाओं से नारी-मुक्ति से सबक लेना चाहिए। मुक्ति के संदर्भ में अशोक वाजपेयी ने कहा कि पुरुषों की मुक्ति भी स्त्री की मुक्ति पर निर्भर है।
पहले सत्र का संचालन इस आयोजन के स्वागताध्यक्ष अजय नावरिया, दूसरे सत्र का ममता किरन, तीसरे सत्र का स्वाति श्वेता, चौथे सत्र का अनिता भारती तथा पांचवे सत्र का संचालन नितीशा खलख़ो ने किया। कार्यक्रम के आयोजन को सफल बनाने में भरत तिवरी और देवेन्द्र गौतम ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया। रमणिका फाउंडेशन के कार्यकारी अध्यक्ष जोसेफ बारा तथा फाउंडेशन के ट्रस्टी पंकज शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। इस अवसर पर लेखक, बुद्धिजीवी और भारी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित थे।
-भरत तिवारी
मीडिया प्रभारी
रमणिका फाउंडेशन


रविवार, 5 जनवरी 2014

साल 2013 का दलित और आदिवासी हिंदी साहित्य

साल 2013 का दलित और आदिवासी हिंदी साहित्य

 रविवार, 5 जनवरी, 2014 को 14:48 IST तक के समाचार
हिन्दी दलित और आदिवासी साहित्य, पुस्तक
दलित-आदिवासी साहित्य की पुस्तकों की यह सूची अपने आप हिंदी में दलित-आदिवासी साहित्य की स्थिति बयाँ करेगी. इनमें से शायद ही किसी किताब का ज़िक्र इससे पहले आई किसी सूची में हुआ है.
साल 2013 में हिंदी में प्रकाशित उल्लेखनीय किताबों की पांचवी किस्त में दलित और आदिवासी साहित्य की उल्लेखनीय पुस्तकें.

रमणिका गुप्ता

रमणिका गुप्ता
रमणिका गुप्ता, सीता-मौसी(उपन्यास), बहू जुठाई (कहानी संग्रह), भीड़ सतर में चलने लगी है, भला मैं कैसे मरती, आदमी से आदमी तक, विज्ञापन बनते कवि (कविता संग्रह) सहित कई पुस्तकें प्रकाशित.
  • नन्हें सपनों का सुख, कविता संग्रह, सरिता बड़ाइक, रमणिका फाउंडेशन, नई दिल्ली
सरिता झारखंड की चिक बड़ाइक जनजाति की हैं. उनकी कविताएँ बहुत अच्छी हैं.
  • आदिवासी दुनिया, आलेख, हरिराम मीणा, नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली
इस किताब में आदिवासियों की भाषा, इतिहास और मिथकों इत्यादि पर लिखा है. उन्होंने सभी आदिवासी जातियों की गोत्र समेत सूची भी दी है.
  • आदिवासी साहित्य विमर्श, आलेख, गंगा सहाय मीणा, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली
यह संपादित पुस्तक है और उल्लेखनीय है.
  • आदिवासी लेखन एक उभरती चेतना, आलेख, रमणिका गुप्ता, सामयिक प्रकाशन
इस किताब में पूर्वोत्तर और पूरे आदिवासी साहित्य की विवेचना की गई है. इसमें उनकी रचनाओं का प्रयोग किया गया है. इसमें लगभग बीस भाषाओं का अनुवाद आपको मिलेगा जिसकी आलोचना की गई है.
  • आदिवासी कहानियाँ, कहानी संग्रह, केदारनाथ मीणा, अलक प्रकाशन, जयपुर
  • भंवर, उपन्यास, कैलाश चंद चौहान, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली
  • मेले में लड़की, कहानी संग्रह, पूनम तूषामड़, सामयिक प्रकाशन
  • महानायक बाबा साहब डॉ. अंबेडकर, उपन्यास, मोहनदास नैमिशराय, धनज्योति चेरिटेबेल ट्रस्ट
महान नायक बाबा साहब अंबेडकर एक बहुत बड़ी कृति है. यह हिन्दी में बाबा साहब पर लिखा गया पहला उपन्यास है.
  • छतरी, कहानी संग्रह, ओमप्रकाश वाल्मीकि, ज्ञानपीठ प्रकाशन
मृत्यु से पहले उन्होंने यह किताब ख़त्म की थी. यह एक महत्वपूर्ण किताब है.


मंगलवार, 19 नवंबर 2013

ओमप्रकाश वालमीकि के निधन पर शोकसभा

दलित साहित्य के अहम हस्ताक्षर ओमप्रकाश वाल्मीकि के निधन पर रमणिका फाउंडेशन, जनवादी लेखक संघ और दलित लेखक संघ के संयुक्त तत्वावधान में रमणिका फाउंडेशन के ए-221 स्थित आवासीय कार्यालय में एक शोकसभा का आयोजन किया गया जिसमें दिल्ली और आसपास के 30 से ज्यादा साहित्यकारों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।
उल्लेख्य है कि स्व. वाल्मीकि जी का जन्म 30 जून 1950 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के बरला गांव में हुआ था।  17 नवंबर 2013 को उनका निधन हो गया। वक्ताओं ने इसे हिन्दी साहित्य की अपूरणीय क्षति बताया। उन्होंने कहा कि हिन्दी पट्टी में दलित साहित्य को अपनी रचनाओं के जरिये स्थापित करने का काम ओमप्रकाश वालमीकि ने किया। उनकी आत्मकथा जूठन ने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दलित साहित्य को पहचान दिलाई। वक्ताओं ने वालमीकि जी के साथ जुड़े अपने संस्मरण सुनाये, उनके साहित्य सृजन पर अपने विचार रखे। दिवंगत आत्मा की शांति के लिये दो मिनट का मौन रखा।  रमणिका गुप्ता जी ने उनके मिशन के प्रति आस्था प्रकट करते हुए उसे आगे बढ़ाने का संकल्प लेने का आह्वान किया।
शोकसभा को प्रो एमपी वर्मा, जनवादी लेखक संघ के महासचिव चंचल चौहान, हेमलता माहेश्वर, महेश कुमार, संजीव कुमार, सत्यानंद निरूपम, अशोक माहेश्वरी, अनिता भारती, धर्मवीर सिंह, सरोज श्रीवास्तव स्वाति, अनीता सोनी, अंजली देशपांडे, सरोज कुमार महानंदा, भगवान प्रसाद श्रीवास्तव, भरत तिवारी, जितेंद्र श्रीवास्तव, जवरीमल्ल पारख, मदन कश्यप, कृष्ण परख, रमेश मंगी, हीरालाल राजस्थानी, केपी मौर्य, विमल सरकार, शिखा गुप्ता, ओम सिंह अशफाक, मित्र  रंजन, अनामिका आर्या,डा. पूरन सिन्हा, डा. अभय कुमार सहित अन्य लोगों ने संबोधित किया। शोकसभा का संचालन अजय नावरिया ने किया.

सोमवार, 30 सितंबर 2013

सांप्रदायिक फ़ासीवाद का उभार और लेखकीय प्रतिरोध का समय

                    चंचल चौहान

निराला की एक कविता है : 'राजे ने अपनी रखवाली की।‘ यह साफ़तौर पर वर्ग-विभाजित समाज में शोषकवर्ग के वर्चस्व से जुड़ी असलियत खोलती है। वाचक ने इस कविता में शोषण के वर्ग आधार और उस पर खड़ी संरचना या सुपरस्ट्र्क्चर के चरित्र को उदघाटित किया है। राजा अपनी रखवाली कि़ला बनाकर, फ़ौजें रखकर तो करता ही है, वह आम जनता को मानसिक रूप से गुलाम बनाकर भी शासन करता रहता है :

कितने ब्राहमण आये
पोथियों में जनता को बांधे हुए
कवियों ने उसकी बहादुरी के गीत गाये
लेखकों ने लेख लिखे
ऐतिहासिकों ने इतिहास के पन्ने भरे
कितने नाटय-कलाकारों ने नाटक रचे
रंगमंच पर खेले ।
जनता पर जादू चला -- राजे के समाज का


समाज के मूलभूत आर्थिक आधार और उसे सहारा देने वाली उपरिसंरचना की यही असलियत हमें मुकितबोध की कविता,अंधेरे में’ के केंद्र में देखने को मिलती है जिसमें रात के अंधेरे में सड़क पर चलने वाले शोषकों के जुलूस में जो शामिल हैं,वे सुपरस्ट्र्क्चर का ही रूप हैं। हिंदी के इन दो महान कवियों की ये कविताएं एक वैज्ञानिक सत्य कहती हैं कि वर्गविभक्त समाज में शोषकवर्ग अपने शोषणपरंपराक्रम को जारी रखने की कोशिश में तरह तरह के खेल खेलता है। पूंजीवाद अपनी इज़ारेदाराना करतूतों से समाज के विशाल हिस्से का शोषण करके उसे इतना ग़रीब बना देता है कि शोषितजन उत्पादन की प्रक्रिया में अलग थलग पड़ जाते हैं और उनके पास कुछ भी ख़रीदने की ताक़त नहीं बच पाती। ऐसे मोड़ पर पूंजीवाद भी भयंकर संकट की चपेट में आ जाता है और तब इजारेदार पूंजीपतिवर्ग शोषित अवाम के सामने फ़ासीवाद का तंत्र पेश करता है इसलिए समाजशास्त्रियों ने फ़ासीवाद की परिभाषा करते हुए यह बताया है कि फ़ासीवाद वित्तीय पूंजी का सबसे घिनौना रूप है। यही घिनौना रूप पिछली सदी के चौथे दशक में भयंकर आर्थिक संकट और मंदी के दौर में विश्वपूंजीवाद ने जर्मनी में हिटलर के रूप में उभारा था जिसने प्रजाति के मिथ्या आधार पर मानवता को बांट कर इस सुंदर धरती को मानवरक्त से रंग डाला था। फ़ासीवाद के घिनौने रूप के प्रतिरोध में उन दिनों दुनिया भर के लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी और संस्कृतिकर्मी संगठित हो कर मानवता को बचाने के अभियान में शामिल ही नहीं हुए, कुछ एक ने तो उनके खि़लाफ़ जंग में हिस्सेदारी करके अपने प्राणों की कुरबानी तक दे दी। भारत के भी कर्इ रचनाकार उस प्रतिरोध में शामिल हुए और उसी से प्रेरणा ले कर उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के रूप में लेखकों को संगठित करने की अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी भी निभायी। हम उन महान रचनाकारों की गौरवपूर्ण परंपरा की मशाल भला कैसे बुझ जाने देंगे! इसलिए दुनिया के किसी भी कोने में अगर फ़ासीवाद अपना सिर उठायेगा, तो हम उसके प्रतिरोध में आगे ज़रूर आयेंगेहमें आगे आना ही चाहिए।

        आज हमारे देश और समाज पर इज़़ारेदार पूंजीपतिवर्ग और बड़े भूस्वामियों के ऐसे गठजोड़ का शासन चल रहा है जो अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी से समझौता करके उसकी बतायी गयी रीतिनीति पर चल रहा है जिसे हम भूमंडलीकरण और उदारीकरण की रीतिनीति के नाम से जानते हैं। इन दोनों नारों का सारतत्व यह है कि उत्पादन के साधनों और वित्तीय संस्थानों पर निजी पूंजी का वर्चस्व हो जाये, जनता की खूनपसीने की कमार्इ से बनाये गये पब्लिक सेक्टर इन्हीं देशी विदेशी इजारेदारों को बेच दिये जायें, राष्ट्रराज्य समाजकल्याण के कामों पर पैसा खर्च न करे। हर सेवा के लिए अवाम पैसा खर्च करे जिससे हर सेवा से निजी पूंजीपतिवर्ग ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमा सके। मेहनतकशों और शोषित समाज को संगठित न होने दिया जाये जहां संगठित हैंउन पर हमले किये जायें और किसी तरह उन्हें असंगठित क्षेत्र में धकेल दिया जाये। समाज पर राजनीतिक कब्ज़ा किसी पार्टी का होनीतियां इज़ारेदार पूंजीपतिवर्ग और उसकी सहयोगी शकित अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी को फ़ायदा पहुंचाने वाली ही रहें अगर आप सांपनाथ से परेशान हो जायें, तो नागनाथ को चुन लें। ये नमो’ नाम के नागनाथ भी उन्हीं इज़ारेदारों के ज़रख़रीद गुलाम हैं जिनकी सेवा में अब तक सांपनाथ लगे रहे। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी यानी आइ एम एफ़ और विश्वबैंक ने अपने दो जानसेवक - प्रधानमंत्री और योजना आयोग के चेयरमैन - भारत के प्रशासन में दाखि़ाल कराये जिससे साम्राज्यवादी ताक़तों के हितों को कोर्इ नुक़सान न पहुंचे। अभी हाल में रिज़़र्व बैंक के गवर्नर भी उन्हीं शक्तियों ने सप्लार्इ किये हैं वे 2003 से 2006 तक आइ एम एफ़ की सेवा में प्रमुख अर्थशास्त्री के पद पर काम कर चुके हैं।
इन सबकी नीतियों से भारत के ग़रीब और बदहाल हो गये। उनमें एक गुस्सा पनप रहा है। यह गुस्सा आजकल कहीं न कहीं तरह तरह से फट पड़ता है। इस गुस्से को देखते हुए वे ही शक्तियां जो कल तक सांपनाथ के माध्यम से अवाम का खून चूस रही थीं, अब एक नया विकल्प नमो’ नामक नागनाथ के रूप में पेश कर रही हैं सांप्रदायिक फ़़ासीवादी संगठन,आर एस एस का चहेता यह नागनाथ सभी शहरों में जा जा कर फुंकार भर रहा है। वही लफ्फ़ाजी कर रहा है जो दुनियाभर के फ़ासिस्ट करते रहे हैं और जो अपनी रीतिनीति में लोकतंत्रविरोधी कार्रवाइयां करते रहे हैं। वह चिल्ला चिल्ला कर कह रहा है कि सरकार का काम व्यापार करना नहीं, सारा व्यापार, सारे कल कारखाने निजी पूंजीपतियों को दे देंगे जिससे वे मनमाना मुनाफा कमा सकें नेहरू का ‘समाजवाद’ नहीं चलने देंगे। वह प्रधानमंत्री अभी बना नहीं, निजीकरण का ढोल कांग्रेस के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा ज़ोर से पीट रहा है। उसने गुजरात के एक उत्सव में देशी विदेशी पूंजीपतियों की ख़ातिरदारी की और उन्हें आश्वस्त किया कि उनका हितसाधन पूरी तरह से यह पूंजीदास करेगा।
     इजारेदार पूंजीपति किस तरह इस सांप्रदायिक फासीवादी नागनाथ को मीडिया पर उभार रहे हैं, यह सत्य किसी से छिपा नहीं है। इंटरनेट की दुनिया में यह छल छिपाया भी नहीं जा सकता। ‘रायटर’ नामक एक विदेशी न्यूज़एजेंसी ने इन नागनाथ की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी की घोषणा से पहले ही 7 सितंबर को संजय मिगलानी की एक रिपोर्ट छापी जो इंटरनेट पर भी उपलब्ध है जिसमें कहा गया है कि भारत के तीन चौथार्इ इज़ारेदार पूंजीपति इस भाजपायी नागनाथ को प्रधानमंत्री पद पर आसीन देखना चाहते हैं। इन पूंजीपतियों के इंटरव्यू टीवी चैनलों पर भी आ रहे हैं जो बिना लागलपेटनमो’ नागनाथ के प्रति अपने प्यार का इज़हार करते रहते हैं।
        सांप्रदायिक फ़ासीवाद की विचारधारा का उभार भारत की आज़़ादी के दौर में विकसित मानवीय मूल्यों के विनाश का कारण बन सकता है। भारत की सदियों की साझा संस्कृति के भावी विकास से ही हम एक आधुनिक सभ्य समाज की रचना कर सकते हैं। हमारे इस अभियान को ऐसी ताक़तों से कहीं ज़्यादा ख़तरा है जिनका जनवाद में विश्वास ही नहीं। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के इरादे से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जगह जगह सांप्रदायिक सदभाव की हत्या करने में अभी से लग गया है। यूपी जैसे हिंदी-उर्दूभाषी क्षेत्र में जहां उनकी सरकार नहीं हैं और जहां पिछले चुनावों में उनको कामयाबी नहीं हासिल हो पायी, यह फ़ासीवादी संगठन पूरी ताक़त से सांप्रदायिक ज़हर फैलाने की कोशिश करने में लग गया है क्योंकि लोकसभा की अस्सी सीटों वाले उत्तर प्रदेश में सफलता हासिल किये बग़़ैर नागनाथ को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचान मुमकिन नहीं आडवाणी जी वाला ही हाल होना है इसलिए संघ यूपी के अवाम के दिलोदिमाग़ में सांप्रदायिक ज़हर भर कर सत्ता हथियाने की जीजान से कोशिश करने में लग गया है। आज भाजपायी अचानक फिर से धर्मधुरंधर हो उठे हैंफिर से मंदिर की अचानक याद आ गयी है, राममंदिर के नाम से करोड़ो रुपये डकार जाने के बाद भूली बिसरी बेचारी अयोध्या की याद फिर से आ गयी है उसकी चौरासी कोसी यात्रा के बहाने धार्मिक भावनाओं का दोहन करने की योजना आदि उसी मक़सद के अक्स हैं।
      यह तथ्य किसी से छिपा नहीं कि आर एस एस लोकतंत्रविरोधी संगठन है। उसी का यह सबूत है कि चुनाव से पहले ही किसी व्यक्ति को भारत के भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश कर दिया जाये। यह क़दम भारत के संविधान की धारा 75 का उल्लंघन करता है जिसमें यह लिखा है कि The Prime Minister shall be appointed by the President and the other Ministers shall be appointed by the President on the advice of the Prime Minister.”(Article 75)। भारत का संविधान किसी पार्टी प्रेसिडेंट को यह अनुमति नहीं देता कि वह भारत के प्रधानमंत्री के नाम की घोषणा करे। मगर बेचारा पार्टी प्रेसिडेंट भी क्या करे, वह तो आर एस एस का ज़रखरीद गुलाम है, हुक्मउदूली करता तो मारा जाता। जो संगठन गांधी जी जैसे महान व्यक्ति की हत्या करवा सकता है तो कोर्इ छुटभइया उसकी हुक्मउदूली करने की जुर्रत कैसे कर सकता है। क्या कोर्इ संगठन इतना कूढ़मग़ज़ हो सकता है जो यह नहीं जानता कि भारत का प्रधानमंत्री बनाने के लिए पहले तो सांसद चाहिए, तो पहले लोकसभा की सारी सीटों के सांसद घोषित करने चाहिएथे, तो भी कुछ तर्कसंगत लग सकता था। उससे पहले एक मैनीफ़ैस्टो पेश करते। मगर ऐसा कुछ भी नहीं। यह सब करते तो सीटों को ले कर जूते चलने लगते फिर मैनीफैस्टो से उन आर्थिक नीतियों का पर्दाफ़ाश हो जाता जो सांपनाथ की भी हैं। इसलिए एक अदद चेहरा पेश कर दिया जिसे चैनलों ने और अख़बारों ने ताजपोशी’ नाम दिया जैसे कि भारत एक सामंती देश है। 15 अगस्त को नागनाथ ने नक़ली लाल कि़ले से बोलने का स्वांग किया खूब हुंकार फुंकार की। एक दिन कहीं द्वारकाधीश कृष्ण की तरह की पोशाक पहन कर हाथ में नकली चक्र थामे हुए उसे टी वी पर सामंती स्वांग करता हुआ दिखाया गया। सब कुछ उल्टा पुल्टा इसीलिए हो रहा है क्योंकि सांप्रदायिक फ़ासीवाद की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कोर्इ आस्था नहीं। इससे जुड़े सांसद झूठमूठ ही संविधान में आस्था की क़सम खाते हैं। झूठहि लेना झूठहि देना / झूठहि भोजन झूठ चबेना।।‘
    गुजरात के विकास की कहानी भी झूठ पर आधारित है। गुजरात उन्नीसवीं सदी से ही पूंजीवादी विकास की ज़द में आ गया था। इसलिए नमो’ नामक नागनाथ ने ऐसा कोर्इ चमत्कार नहीं कर दिया जिसका ढोल पीटा जा रहा है। वह विकास कर्इ अन्य राज्यों की तुलना में इस समय भी ज्यादा नहीं है। नीचे की तालिका से यह साफ हो जायेगा कि किस तरह जनता के सामने झूठ पर झूठ परोसा जा रहा है:
                         Year-wise List of Top Ten States with GDP Shares (in Rs Crore)

State/UT        1999-2000   2001-2002           2003-2004   2005-2006       2007-2008   2009-2010       2010-2011
Maharashtra    2,47,830         2,73,188                3,40,600      4,83,222          6,79,004      9,01,330          10,29,621
Uttar Pradesh   1,75,159         1,90,269                2,26,972      2,91,936          3,79,917      5,19,899          5,95,055
Andhra Pradesh  1,28,797         1,56,711                1,90,017      2,55,941          3,64,813      4,75,267          5,88,963
Tamil Nadu     1,34,185         1,48,861                1,75,371      2,57,730          3,50,785      4,64,009          5,47,267
Gujarat          1,09,861       1,23,573                1,68,080      2,44,736          3,29,285      4,29,356          5,13,173
West Bengal     1,35,376         1,57,144                1,89,259      2,30,639          2,98,566      4,00,561          4,73,890
Karnataka       1,01,247        1,12,847                1,30,990      1,95,750          2,70,843      3,35,747          4,05,123
Rajasthan         82720        91771          1,11,606      1,42,236          1,94,822      2,55,440          3,23,682
Kerala           69168            7924              96698      1,36,842          1,75,141     2,30,316          2,76,997
Delhi             55220       65027            79468      1,15,374          1,57,947      2,17,851          2,64,496

इस तालिका से ज़ाहिर है कि गुजरात का नाम पांचवे स्थान पर है अन्य चार राज्य कहीं आगे हैं। इसी तरह तीन बार चुनाव जीत जाने से कोर्इ चमत्कारी इंसान नहीं बन जाता। शीला दीक्षित ने भी तीन बार चुनावा जीता, प. बंगाल के वाममोर्चे ने तो रिकार्ड ही क़ायम कर दिया, त्रिपुरा की भी यही स्थिति है जहां पहले के मुक़ाबले इस बार वाममोर्चे को ज़्यादा सीटें हासिल हुर्इं, जब कि गुजरात में पहले नमो’ ने 117 सीटें हासिल की थीं उसके बाद के चुनाव में दो सीटें कम हो गयीं, इसे उसकी अपने ही राज्य में घटती लोकप्रियता का ही सबूत कहेंगे।  विविधता में एकता’ वाले भारत देश के हर कोने में कोर्इ सांप्रदायिक फ़ासीवादी अभी से लोकप्रिय होने का दावा करे तो यह हास्यास्पद ही होगा।
        भारत की साझा संस्कृति में यक़ीन रखने वाले और लोकतांत्रिक जनवादी मूल्यों के विकास के लिए प्रतिश्रुत सभी रचनाकारों और संस्कृतिकर्मियों का आज के दौर में यह सामाजिक दायित्व है कि वे सांप्रदायिक फ़ासीवाद के मंसूबों को समझते हुए इज़ारेदार पूंजीपतियों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के द्वारा भारत पर थोपे जा रहे नमो’ नागनाथ के हाथ भारत की राजनीतिक सत्ता सौंप देने की चालों को नाकाम करने में अपने आलोचनात्मक विवेक का पूरा प्रयोग करें और अपने प्रतिरोध की आवाज़ सभी संभव मंचों व माध्यमों से जन जन तक पहुंचायें इसी प्रक्रिया में अधिक से अधिक रचनाकारों को आज संगठित होने की भी ज़रूरत है जिससे यह अभियान एक संगठित ताक़त बन सके।
अंत में, एक रचनाकार की इस चिंता को व्यक्त करती हुर्इ असद ज़ै़दी की इस कविता में हम सभी खुद को शरीक करें :

            आम चुनाव
            असद ज़ैदी

आम चुनाव में मतदान के रोज़
अपनी बारी के इंतज़ार में खड़े मोहन भाई
किसी और युग में भटकने लगे

वहीदा रहमानी
कुसुमलता माथुर
एक वी गौरी देवी
सुमित्रा भट्ट
इनमें चुनाव का सवाल ही क्या
दिल तो इन सबसे लगाया ही था

एक तपस्वी की तरह
कोई इस इतिहास को तो बदल नहीं सकता
गर इनमें किसी से रू.ब.रू कुछ कह न सके
तो अपने ही स्वभाव का दोष था
और इस बात का अफ़सोस भी क्या करना
एक भी औरत अब इस शहर में नहीं
कहां हैं वे सब, जानने की कोशिश ही न की

ऐ भली औरतो ऐ सुखी औरतो
तुम जहां भी हो
अगर वोट डालने निकल ही पड़ी हो
तो कहीं भूल के भी न लगा देना

उस फूल पर निशान ।

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

रमणिका गुप्ता का एकल काव्यपाठ

दिल्ली में राजा जो बैठा
कर्जे से परीशान जान लो
विश्व बैंक की धमकी सुन-सुन
करता छंटनी जाप जान लो
मजदूरों का भी अब भाई-मन
मोटा-सोटा हाल जान लो.

गोल्डन ले लो, गोल्टन ले लो
नित नबाधा पाठ सुनाए
नौकरी पर खतरा है भाई
शर्तों की बौछार लगाए
कब तक बकरी खैर मनाए
लटक रही तलवार जान लो
मोटा-सोटा हाल जान लो
साहित्य अकादमी में एकल काव्यपाठ के दौरान हिंदी की चर्चित कवयित्री रमणिका गुप्ता ने जब सरकार की स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति पर कटाक्ष करते हुए लिखी अपनी कविता मोटा-सोटा हाल जान लो की इन पंक्तियों का पाठ किया तो  हाल में बैठे श्रोता मंत्रमुग्ध हो उठे। इस मौके पर उन्होने करीब दो दर्जन चुनींदा कविताओं का पाठ किया।
 मैंने हवा से कहा
रुको
मैं तुम्हें पढ़ना चाहती हूं
हवा ने कहा-
मैं रुक गई तो
तुम भी रुक जाओगी
फिर पढ़ेगा कौन..(मैंने हवा से कहा)
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पेचगी के पत्ते सा
 डोले है सागर
मन मोरा धुरी-धुरी
होले है पागल
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सूरज के चूल्हे पे
सागर बिराजता
उफन-उफन जात है
देगची में भात सा
उबल-उबल
माड़ गिरी जा रही
घर आंगन की याद है जला रही
मोर मितवा की
याद मोहे आ रही  (पेकची के पत्ते सा)
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 इसी तरह उनकी कविता मैंने हवा से कहा, मैं हवा को पढ़ना चाहती हूं। जड़ें हवा की। मैंने तोड़ी है सदियों से सीखी चुप्पी, तोड़ देती हूं, सब मीडिया का कमाल है, पूर्व निर्धारित ढांचा, बरगद का छाता, पीठ पर बच्चे, विजय का अर्थ जान गए हैं, वे बोलते नहीं थे, पेचकी के पत्ते सा, इतनी जिजीविषा, तुम्हें पाना, द्खो-देखो, पहाड़ जैसा आदमी,  मैं ड्यूटी पर नहीं जाऊंगा रे मितवा, बहस, दर्पण, जीती या वो आदि तमाम कविताओं पर लोग वाह-वाह कर उठे। 

भारतीय समाज में मां सबसे बड़ा वर्जनाओं का पिटाराः रमणिका गुप्ता

स्त्रीकाल के इस अंक के लिए यह यह माकूल समय नहीं है। यह विवादों का काल है, विरोध का काल है. भ्रष्टाचार का काल है, प्रतिरोध का काल है। हिन्दी की सुप्रसिद्ध लेखिका एवं कवयित्री रमणिका गुप्ता ने मेरी ई जोन की बातों पर सहमति व्यक्त करते हुए अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में यह बातें कहीं। अवसर था 24 सितंबर  को शाम चार बजे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सभागार में  आयोजित स्त्रीकाल पत्रिका के दलित स्त्रीवादः चुनौतियां और लक्ष्य विशेषांक के लोकार्पण के मौके पर आयोजित परिचर्चा का। रमणिका गुप्ता ने  कहा कि दलित स्त्रीवाद में मैं वाद वाद को उचित नहीं समझती। इसे आंदोलन मानती हूं। दलित स्त्री तीन तरह से शोषित है। दलित होने के कारण, स्त्री होने के कारण, और गरीब होने के कारण। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में मां ही सबसे बड़ा वर्जनाओं का पिटारा है। वही सबसे ज्यादा रोक-टोक निषेध लादती है। साथ ही हमारी भाषा भी हमें गुलाम बनाती है। पति को स्वामी या मालिक पुकारा जाता है। यह गुलामी का भाव है। उन्होंने कहा कि दलित स्त्रीवादी आंदोलन चलाने के लिए हमें व्रत उपवास व पूजा-पाठ छोड़ने होंगे।  इससे पूर्व मेरी ई जोन ने कहा था कि 21 वीं सदी स्त्रीकाल की सदी नहीं यह विवादों और विकृतियों की सदी है। संघर्ष की शुरूआत है। 85 प्रतिशत महिलाएं पुरुषों पर आश्रित हैं। इस परिचर्चा का विषय प्रवर्तन पत्रिका के इस अंक की संपादक अनीता भारती ने किया। अन्य वक्ताओं में सुजाता पारमिता, मीना गोपाल, रजनी दिसोदिया, देवेंद्र चौबे और बजरंग बिहारी थे। इस मौके पर अनीता भारती ने कहा कि यह विशेषांक दलित स्त्री के श्रम और आंबेडकरवाद से प्रेरित मानवतावादी सोच को समर्पित है।
मीना गोपाल ने कहा कि स्त्रीवाद में अबतक मुख्यधारा की स्त्रियों पर काम हुआ है पर अन्य स्त्रियों पर नहीं। डांस बार के बंद होने पर चिंता जताते हुए उन्होंने इसे दलित स्त्री के श्रम से जुड़ा प्रश्न बताया। 

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