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शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

रमणिका जी अस्पताल से वापस लौटीं


रमणिका जी अपोलो अस्पताल से इलाज के बाद घर लौट आयी हैं। अब वे स्वस्थ हैं। 2 नवंबर को  उन्हें देर रात को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा था। 13 नवंबर को वे अस्पताल से डिसचार्ज हुईं। घर पहुंचते ही लेखन संपादन कार्य में सक्रिय हो गईं।  इस बीच देश के विभिन्न इलाकों से उनके शुभचिंतकों के फोन आते रहे। जो आ सकते थे अस्पताल में मिलने आये। हम रमणिका फाउंडेशन की ओर से उन सभी शुभचिंतकों को धन्यवाद देते हुए स्नेह बनाये रखने की अपील करते हैं।

---रमणिका फाउंडेशन

शुक्रवार, 18 जून 2010

पुरुषनिर्मित सौन्दर्यकसौटी पर ही खुद को तोलती है औरतें

विचित्र तो यह है कि स्त्री की मुक्ति का अहसास होने के बावजूद आज भी स्त्री पुरुषनिधार्रित सौन्दर्यमानकों के खांचों में खुद को फिट करने की होड. में शामिल है।


आज भी उनका सौंदर्यबोध  उनका सपना पुरुष की नज़रों  में सुन्दर लगना ही है। उनकी चाहत है ऐसी देह, जो पुरुष को आकर्षित कर सके, जिस पर पुरुष मुग्ध हो जाए। ऐसी कसौटी जिस पर वह सराही जाये, जिसे पुरुषों ने ही गढ़ा  है। यानी ३६.२४.३६ की गोरी, कोमल, नाज़ुक, नफीज़ दिखने वाली एक ऐसी देहयष्टि, जो पुरुषों को मुग्ध कर सके या उनमें हजारों में एक का स्वामी होने का आभास पैदा कर सके।

यूँ तो आकर्षित करने का  इम्पल्स पशुओं में भी होती है लेकिन वह प्रकृति  द्वारा प्रदत्त निधारित और निश्चित आचरण होता है। मनुष्य अपना आचरण खुद तय करता है, इसलिए स्त्री  यदि अपने अनुकूल आचरण तय करती है, तो वह ज्यादा आत्मनिर्भर बन सकती है। देह का ही मामला लें। कामकाजी महिला को चुस्तदुरुस्त, हाजिर जवाब, हिलमिल कर काम करने का स्वभाव, सूचनाओं से लैस और साहसी होना जरूरी होता है, छुईमुई बनना नहीं। ऐसा होने पर कार्यस्थल पर वह पुरुषों में व्याप्त कामुक नजरों का मुकाबला ज्यादा मुस्तैदी से कर सकती है। यदि वह नाज़ुक, नफीज़  या फिगर के घेरे में ही सीमित रहे अथवा इसी चक्कर  में रहे कि वह पुरुष की नज़र  में कैसी लगती है, तो उसका काम प्रभावित होता है और बहुत से पुरुष उसके आश्रयदाता बनकर उसके बदले काम करने का प्रलोभन देकर, उसे अपने वश में करने का प्रयास करने लगते हैं।
 
आखिर स्त्रियों  में भी, मर्दों द्वारा अपनी तुष्टि व आनंद के लिए गढ़ी  गई एक तिलस्माई लेकिन कठपुतलीनुमा छवि वाली स्त्री की कसौटी यानी एक नाज़ुक , पतलीदुबली, गोरी, बड़े बड़े उरोज, गुदगुदे और बड़े बड़े नितम्ब, लम्बा कद, पतली कमर, लम्बी उंगलियां, छोटे पांव, लम्बी गर्दन, लम्बे व चमकदार बालों वाली स्त्री  के प्रति सम्मोहन क्यों  है? पुरुष एक ऐसी ही कमनीय स्त्री  की कामना करता है और ऐसी ही स्त्री  को अपनी अंकशायिनी बनने के काबिल समझता व मानता है। ऐसी ही स्त्री उसे आकर्षित करती है। ऐसी स्त्री  उसकी अंकशायिनी तो बनती है पर प्रायः वह उसके आदर की पात्र नहीं होती। पुरुष भोगने के पहले और बाद में भी ऐसी सुन्दर स्त्री  के चरित्र को प्रायः शंकालु और हेय नजरों से देखता है। वह उस परपुरुष को मोहने का आरोप तक लगा कर खुद को दोष मुक्त  कर लेता है। इससे साफ ज़ाहिर  है कि पुरुष एक कमजद्रोर स्त्री की ही कामना करता है की जिस पर वह हावी हो सके जिसे वह अपने  वश में रख सके। किन्तु स्त्रीयों  खुद को पुरुष अभीप्रिय छवि में फिट करने को आतुर रहती है। इसका जवाब स्त्री  का पुरुषवादी मानसिकता से आतंकित होना ही है।

हांलांकि मुझे बाजारवादी मॉडल या फिल्मी दुनिया को ऐसी स्त्री  से बिल्कुल ऐतराज नहीं है लेकिन उनके सौंदर्य का मापदंड पुरुष ने निर्धारित किया है। और पुरुष प्रायः केवल स्त्री  की देह को देखता है, देहधारी की क्षमता और काबिलियत को नज.रअंदाज कर देता है। वह, यानी स्त्री  कितनी गुणवान  है, कितनी सामाजिक है, गुणवान या ईमानदार है, यह पुरुषों के लिए मायने नहीं रखता। बस कितनी मुग्धकारी तस्वीरसी लगती है वही उनकी कसौटी है। विडम्बना तो यह है कि अज्ञानवश अधिकांश स्त्रियाँ  भी इसी पुरुष दृष्टी  से ही सोचती हैं। सुन्दर लगना स्त्रियित्व  तो क्या  मनुष्य का गुण है पर सुन्दर वस्तु बनना जड़ता  का प्रतीक है, जीवन्त मनुष्य का नहीं। स्त्राी जरूर सुन्दर लगे या सुन्दर लगने का प्रयास करे पर ,पुरुष के लिए भोग्या बनने के लिए नहीं बल्कि इसलिए कि सुन्दरता एक गुण है, विशेषता है स्त्री का सुन्दर व आकर्षक लगना उसका स्वभाव है, गुण है एक मानवीय बोध है, जिसे आत्मसात किया जाना चाहिये वस्तु मान कर भोगना नहीं। अजीब विडम्बना है कि पुरुष ने स्त्री  का मानक ऐसा गढ़ा  है, जिसमें वह कमज़ोर व  पराश्रित दिखती है। ऐसी नाजुक कि बिना पुरुष के सहारे आगे ही न बढ सके। किन्तु स्त्री  ने पुरुष के लिए जो मानक गढ़ा है  वह ठीक इसके उलट है। इसलिए हर पुरुष स्त्री  के समक्ष खुद हृष्ट पुष्ट, बलिष्ठ व चुस्त दुरुस्त दिखने की चेष्टा करता है चूंकि स्त्रियों  ने उसके लिए ऐसा ही मानक गढ रखा है! यानी ऐसा पुरुष जो उसे वश में रख सके। यही वह ग्रन्थि है जो सदियों से स्त्री  के अवचेतन में उसके पोरपोर में ठूंसठूंस कर भरी जाती रही है कि उसे पुरुष के अधीन उसके वश में ही रहना है। स्त्री  को अपने अर्न्तमन की यही गांठ खोलनी है और इसी से उसे मुक्त होना है।

हालांकि ये मानक व्यक्तिगत  रुचि के अनुसार बदले भी हैं और बदल भी रहे हैं। पर प्रचारित प्रसारित व समाज में आदर्श केवल ऊपर  वर्णित मानकों को ही माना गया है। किन्तु अब स्त्री  पुरुष के सब मानदण्डों व नजरियों को बदलने की जरूरत है।


दरअसल स्त्रियों  को खुद में अन्तेर्द्रिष्टि  पैदा करनी होगी अधिकांश स्त्रियाँ  पुरुष दृष्टि से ही ग्रस्त हैं। अभी तक स्त्रियाँ  खुद भी दूसरी स्त्री को एक स्त्री  के रूप में देखने की क्षमता हासिल नहीं कर सकीं हैं, इसीलिए वे स्त्री  होने के नाते दूसरी स्त्री  की त्रासदी को नहीं समझ पातीं। सासबहू का विवाद ऐसी ही सोच का परिणाम है। वे रिश्तों के संदर्भ में ही दूसरी औरत को समझती हैं। मां भी बेटी को बेटी यानी सन्तान के नाते ही पहचानती है और बेटी मां को मां के रिश्ते के नाते। दोनों एकदूसरे को एक औरत होने के नाते नहीं समझतीं। जिस दिन यह सोच निर्मित हो जाएगी, उस दिन स्त्री  अपनी मुक्ति की आधी लडाई जीत लेगी।

सन्तान का मोह भी स्त्री को गुलाम बनाता है। ऐसा लगता है जैसे स्त्री  ने ही सारी ममता का ठेका ले रखा है। पुरुष क्यों नहीं सन्तान के मोह में पडता? वह भी तो पिता होता है। सारा दायित्व औरत पर ही क्यों ? ये प्रश्न जवाब खोजते हैं। 

शनिवार, 16 जनवरी 2010

इस सोच के पीछे कौन?

इस सोच के पीछे कौन?





यह फाउंडेशन श्रीमती रमणिका गुप्ता का मानस-शिशु है जो एक महत्वपूर्ण सामाजिक व्यक्तित्व हैं और जिन्होंने सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को नई पहलकदमियों की शृंखला के माधयम से एक नया आयाम दिया है। उनकी इच्छा, उनका दृढ़ निश्चय और उनकी योग्यता ने औरों को भी मानवीय कारणों से फाउंडेशन को, गूंगे को आवाज़ देने वाला एक शक्तिशाली और लोकप्रिय मंच बनाने के लिए प्रेरित किया है। बचपन से ही विद्रोही वे बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी हैं। आज वे एक सामाजिक कार्यकर्ता, संस्कृतिकर्मी, समकालीन हिन्दी साहित्य की महत्वपूर्ण लेखिका-कवयित्री और एक श्रमिक नेता के रूप में ख्यात और प्रतिष्ठित हैं। उनकी गतिविधियां और समर्पण ऊपरी तौर पर भले ही बिखरीं और उग्र या दुष्कर लगें लेकिन जो भी गहराई में जाकर विचार करेगा वह महसूस करेगा कि आदिवासी, दबे-कुचले व वंचित समाज के बेहतर भविष्य के आदर्श से उनका जीवन-दर्शन जुड़ा हुआ एवं प्रभावित है। सामान्य आदमी की योग्यता और अच्छाई में उनका अदम्य विश्वास है। वे मानती हैं कि हर प्रकार के अन्याय को बढ़ावा देने और उसे वैधानिकता प्रदान करने वाले पारंपरिक वंशानुगत सामाजिक वर्गीकरण को नष्ट करने में जनसाधारण महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। श्रमिक आंदोलन के प्रमुख पैरोकार के रूप में पैंतीस वर्षों से झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में आदिवासियों, दलितों एवं स्त्रियों के अधिकार के लिए वे एक अंतहीन संघर्ष छेड़े हुए हैं। वहां घर-घर में लोग उन्हें जानते हैं। वे वाम-लोकतांत्रिक संगठन से जुड़ी हुई हैं और विधान सभा तथा विधान परिषद में दलितों का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि आज के दौर में जबकि लोगों का निजी जीवन और सामाजिक जीवन में परस्पर मेल कठिन है, उनका मौलिक जीवन-दर्शन और जीवन-व्यवहार एक समान है। उनका जीवन हर प्रकार के अन्याय और अतीतोन्मुख व्यवहार के खिलाफ एक जंग है। 1948 में किए अपने अंतर्जातीय विवाह और समाज तथा परिवार के वर्चस्व के खिलाफ वैयक्तिक स्वतंत्रता और जगह के लिए उन्होंने संघर्ष किया। उन्होंने कभी भी पुरानी अनुपयोगी परंपराओं का आदर नहीं किया।



सामाजिक बदलाव की उनकी इच्छा, उनका दृढ़ निश्चय और व्यग्रता फाउंडेशन की बहुआयामी गतिविधियों से प्रकट लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। अपने लेखकीय जीवन में उन्होंने गद्य एवं पद्य विधा की कई महत्वपूर्ण किताबें लिखीं जिसमें उपेक्षितों खासकर आदिवासी और दलित स्त्रियों के प्रति प्रेम और आदर झलकता है, जो उन्हें हृदय से प्रिय हैं। यह उनकी पत्रिका 'युध्दरत आम आदमी' के नाम से ही प्रकट होता है जिसका शाब्दिक अर्थ है 'अपने अस्तित्व के प्रति संघर्षरत आम आदमी।' इस ख्याति प्राप्त पत्रिका का वे वर्षों से कुशल संपादन करती आ रही हैं। उनकी पत्रिका न केवल लोकप्रिय सामाजिक-संस्कृति मुद्दों और गरीबों की समस्या को उठाती हैं बल्कि यह बात भी रेखांकित करने लायक है कि उनके सहयोगी लेखक भी अधिकतर दलित, कमजोर और वंचित दलित आदिवासी समुदाय के ही होते हैं। उन रचनाकारों को हिंदी साहित्य में किसी से भी ज्यादा प्रकाशन और अपनी पत्रिका में गौरवपूर्ण स्थान देकर उन्होंने दलित-आदिवासी व महिला लेखकों के मुद्दों को उठाया है।



'युध्दरत आम आदमी' के तेलुगु, गुजराती और पंजाबी साहित्य में दलित लेखन पर केंद्रित विशेषांक और ग्यारह क्षेत्रीय भाषाओं के लेखकों द्वारा आदिवासी लेखन पर दो खंडों में 'आदिवासी स्वर और नई शताब्दी' विशेषांक उल्लेखनीय कार्य हैं। रमणिका जी ने नाटक, कथा साहित्य एवं विश्लेषणात्मक दलित खंडों का हिन्दी और अहिन्दी भाषाओं में परस्पर अनुवाद कार्य के अलावा, दलित लेखन पर आलोचनात्मक कार्य भी किया है। उन्होंने यह सब दलित-आदिवासी प्रतिभाओं को राष्ट्रीय नेटवर्क प्रदान करने के लिए किया है और सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से बेहद जरूरतमंद वर्गों में जागरूकता फैलाने की तरफ लोगों के धयानाकर्षण के लिए प्रेरक की भूमिका निभाई है।



दरअसल उनकी सारी रचनात्मक ऊर्जा और भौतिक स्रोत, उनका समय और उनकी जगह, एक बड़े सामाजिक लक्ष्य से जुड़े हुए हैं। ऐसे में जबकि वे लंबे हृदय रोग के कारण जीवन के लिए संघर्ष कर रही हैं उनका धौर्य और संघर्ष अंधोरे में रोशनी जलाने की तरह अपने आप में अनूठा है। अपने सपनों को सच करने के लिए वे पूरी जीवंतता, उत्साह और उम्मीद के साथ निरंतर मिशनरी भावना से कार्य करती हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि डिफेंस कॉलोनी स्थित उनका घर जहां से वे अभी संगठन के सारे काम चलाती हैं देश भर के दलित-आदिवासी बौध्दिकों और कार्यकर्ताओं का प्रिय शिविर बन गया है। सचमुच आज वे युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत और आदर्श बन गई हैं और विभिन्न क्षेत्रों-स्तरों से आने वाले युवाओं को आत्मिक प्रेम, स्नेह देकर उनका उत्साह बढ़ाते हुए उनमें नेतृत्व एवं सांगठनिक क्षमता विकसित करती हैं क्योंकि उनका कहना है ''यह तो संघर्ष की शुरुआत है...''

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